वाल्मीकि रामायण 5.56.4
शरैस्तु सङ्कुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः ।मां नयेद्यदि काकुत्स्थस्तत्तस्य सदृशं भवेत्॥
śaraistu saṅkulāṃ kṛtvā laṅkāṃ parabalārdanaḥ |māṃ nayedyadi kākutsthastattasya sadṛśaṃ bhavet ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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