वाल्मीकि रामायण 5.59.2
सफलो राघवोद्योगः सुग्रीवस्य च संभ्रमः ।शीलमासाद्य सीताया मम च प्रवणं मनः॥
saphalo rāghavodyogaḥ sugrīvasya ca saṃbhramaḥ |śīlamāsādya sītāyā mama ca pravaṇaṃ manaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें