वाल्मीकि रामायण 5.60.3
दृष्टा देवी न चानीता इति तत्र निवेदनम् ।अयुक्तमिव पश्यामि भवद्भिः ख्यातविक्रमैः॥
dṛṣṭā devī na cānītā iti tatra nivedanam |ayuktamiva paśyāmi bhavadbhiḥ khyātavikramaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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