वाल्मीकि रामायण 5.60.4
न हि नः प्लवने कश्चिन्नापि कश्चित्पराक्रमे ।तुल्यः सामरदैत्येषु लोकेषु हरिसत्तमाः॥
na hi naḥ plavane kaścinnāpi kaścitparākrame |tulyaḥ sāmaradaityeṣu lokeṣu harisattamāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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