वाल्मीकि रामायण 5.67.3
सुखसुप्ता त्वया सार्धं जानकी पूर्वमुत्थिता ।वायसः सहसोत्पत्य विरराद स्तनान्तरे॥
sukhasuptā tvayā sārdhaṃ jānakī pūrvamutthitā |vāyasaḥ sahasotpatya virarāda stanāntare ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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