वाल्मीकि रामायण 5.67.4
पर्यायेण च सुप्तस्त्वं देव्यङ्के भरताग्रज ।पुनश्च किल पक्षी स देव्या जनयति व्यथाम्॥
paryāyeṇa ca suptastvaṃ devyaṅke bharatāgraja |punaśca kila pakṣī sa devyā janayati vyathām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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