वाल्मीकि रामायण 5.68.5
गते हि त्वयि विक्रान्ते पुनरागमनाय वै ।प्राणानामपि सन्देहो मम स्यान्नात्र संशयः॥
gate hi tvayi vikrānte punarāgamanāya vai |prāṇānāmapi sandeho mama syānnātra saṃśayaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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