वाल्मीकि रामायण 6.1.2
कृतम् हनुमता कार्यम् सुमहद्भुवि दुर्लभम् ।मनसापि यदन्येन न शक्यम् धरणीतले॥
kṛtam hanumatā kāryam sumahadbhuvi durlabham |manasāpi yadanyena na śakyam dharaṇītale ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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