वाल्मीकि रामायण 6.120.6
कर्ता सर्वस्य लोकस्य श्रेष्ठो ज्ञानवतां वरः ।उपेक्षसे कथं सीतां पतन्तीं हव्यवाहने॥
kartā sarvasya lokasya śreṣṭho jñānavatāṃ varaḥ |upekṣase kathaṃ sītāṃ patantīṃ havyavāhane ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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