वाल्मीकि रामायण 6.22.2
शरनिर्दग्धतोयस्य परिशुष्कस्य सागर ।मया निहतसत्त्वस्य पाम्सुरुत्पद्यते महान्॥
śaranirdagdhatoyasya pariśuṣkasya sāgara |mayā nihatasattvasya pāmsurutpadyate mahān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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