वाल्मीकि रामायण 6.22.60
समुत्पतितम् आकाशम् अपासर्पत् ततस् ततः ।समुद्रम् क्षोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः॥
samutpatitam ākāśam apāsarpat tatas tataḥ |samudram kṣobhayāmāsurnipatantaḥ samantataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें