वाल्मीकि रामायण 6.39.10
नित्य मत्त विहम्गानि भ्रमर आचरितानि च ।कोकिल आकुल षण्डानि विहग अभिरुतानि च॥
nitya matta vihamgāni bhramara ācaritāni ca |kokila ākula ṣaṇḍāni vihaga abhirutāni ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें