वाल्मीकि रामायण 6.39.24
चैत्यः स राक्षस इन्द्रस्य बभूव पुर भूषणम् ।शतेन रक्षसाम् नित्यम् यः समग्रेण रक्ष्यते॥
caityaḥ sa rākṣasa indrasya babhūva pura bhūṣaṇam |śatena rakṣasām nityam yaḥ samagreṇa rakṣyate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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