वाल्मीकि रामायण 6.39.26
नानाविहगसम्घष्टाम् नानामृगनिषेविताम् ।नानाकुसुमसंपन्नाम् नानाराक्षससेविताम्॥
nānāvihagasamghaṣṭām nānāmṛganiṣevitām |nānākusumasaṃpannām nānārākṣasasevitām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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