वाल्मीकि रामायण 6.39.28
ताम् महागृहसम्बाधां दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः ।नगरीं त्रिदिवप्रख्यां विस्मयं प्राप वीर्यवान्॥
tām mahāgṛhasambādhāṃ dṛṣṭvā lakṣmaṇapūrvajaḥ |nagarīṃ tridivaprakhyāṃ vismayaṃ prāpa vīryavān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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