वाल्मीकि रामायण 6.41.2
असम्मन्त्र्य मया सार्द्धं तदिदं साहसं कृतम् ।एवं साहसकर्माणि न कुर्वन्ति जनेश्वराः॥
asammantrya mayā sārddhaṃ tadidaṃ sāhasaṃ kṛtam |evaṃ sāhasakarmāṇi na kurvanti janeśvarāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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