वाल्मीकि रामायण 6.41.5
भरतेन महाबाहो लक्ष्मणेन यवीयसा ।शत्रुघ्नेन च शत्रुघ्न स्वशरीरेण वा पुनः ॥ ६.४१.५ ॥पुनःपुनः ॥॥
bharatena mahābāho lakṣmaṇena yavīyasā |śatrughnena ca śatrughna svaśarīreṇa vā punaḥ || 6.41.5 ||punaḥpunaḥ || ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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