वाल्मीकि रामायण 6.41.91
रावणस्तु परं चक्रे क्रोधं प्रासादधर्षणात् ।विनाशं चात्मनः पश्यन्निश्वासपरमो ऽभवत्॥
rāvaṇastu paraṃ cakre krodhaṃ prāsādadharṣaṇāt |vināśaṃ cātmanaḥ paśyanniśvāsaparamo 'bhavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें