वाल्मीकि रामायण 6.46.4
अचेष्टौ मन्दनिश्वासौ शोणितौघपरिप्लुतौ ।शरजालाचितौ स्तब्धौ शयानौ शरतल्पयोः॥
aceṣṭau mandaniśvāsau śoṇitaughapariplutau |śarajālācitau stabdhau śayānau śaratalpayoḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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