वाल्मीकि रामायण 6.48.3
यज्वनो महिषीं ये मामूचुः पत्नीं च सत्रिणः ।ते ऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनो ऽनृतवादिनः॥
yajvano mahiṣīṃ ye māmūcuḥ patnīṃ ca satriṇaḥ |te 'dya sarve hate rāme jñānino 'nṛtavādinaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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