वाल्मीकि रामायण 6.49.30
मित्रकार्यं कृतमिदं भवद्भिर्वानरर्षभाः ।अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं गन्तुमर्हथ॥
mitrakāryaṃ kṛtamidaṃ bhavadbhirvānararṣabhāḥ |anujñātā mayā sarve yatheṣṭaṃ gantumarhatha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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