वाल्मीकि रामायण 6.52.3
घोरैश्च परिघैश्चित्रैस्त्रिशूलैश्चापि संहतैः ।राक्षसैर्वानरा घोरैर्विनिकृत्ताः समन्ततः॥
ghoraiśca parighaiścitraistriśūlaiścāpi saṃhataiḥ |rākṣasairvānarā ghorairvinikṛttāḥ samantataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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