वाल्मीकि रामायण 6.58.16
वज्रस्पर्शतलैर्हस्तैर्मुष्टिभिश्च हता भृशम् ।वैमुः शोणितमास्येभ्यो विशीर्णदशनेक्षणाः॥
vajrasparśatalairhastairmuṣṭibhiśca hatā bhṛśam |vaimuḥ śoṇitamāsyebhyo viśīrṇadaśanekṣaṇāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें