वाल्मीकि रामायण 6.58.30
यकृत्प्लीहमहापङ्कां विनिकीर्णान्त्रशैवलाम् ।भिन्नकायशिरोमीनामङ्गावयवशाद्वलाम्॥
yakṛtplīhamahāpaṅkāṃ vinikīrṇāntraśaivalām |bhinnakāyaśiromīnāmaṅgāvayavaśādvalām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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