वाल्मीकि रामायण 6.58.43
रोषितः शरवर्षेण सालेन महता महान् ।प्रजघान हयान्नीलः प्रहस्तस्य मनोजवान्॥
roṣitaḥ śaravarṣeṇa sālena mahatā mahān |prajaghāna hayānnīlaḥ prahastasya manojavān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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