वाल्मीकि रामायण 6.6.5
उच्यताम् नः समर्थम् यत् कृतम् च सुकृतम् भवेत् ।मन्त्र मूलम् हि विजयम् प्राहुर् आर्या मनस्विनः॥
ucyatām naḥ samartham yat kṛtam ca sukṛtam bhavet |mantra mūlam hi vijayam prāhur āryā manasvinaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें