वाल्मीकि रामायण 6.6.8
मित्रैर् वा अपि समान अर्थैर् बान्धवैर् अपि वा हितैः ।सहितो मन्त्रयित्वा यः कर्म आरम्भान् प्रवर्तयेत्॥
mitrair vā api samāna arthair bāndhavair api vā hitaiḥ |sahito mantrayitvā yaḥ karma ārambhān pravartayet ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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