वाल्मीकि रामायण 6.64.6
यांस्तु धर्मार्थकामांस्त्वं ब्रवीषि पृथगाश्रयान्।अनुबोद्धुं स्वभावे तान्नहि लक्षणमस्ति ते॥
yāṃstu dharmārthakāmāṃstvaṃ bravīṣi pṛthagāśrayān |anuboddhuṃ svabhāve tānnahi lakṣaṇamasti te ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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