वाल्मीकि रामायण 6.65.2
सो ऽहं तव भयं घोरं वधात्तस्य दुरात्मनः।रामस्याद्य प्रमार्जामि निर्वैरो हि सुखी भव॥
so 'haṃ tava bhayaṃ ghoraṃ vadhāttasya durātmanaḥ |rāmasyādya pramārjāmi nirvairo hi sukhī bhava ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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