वाल्मीकि रामायण 6.65.31
सर्वाभरणसर्वाङ्गः शूलपाणिः स राक्षसः।त्रिविक्रमकृतोत्साहो नारायण इवाबभौ॥
sarvābharaṇasarvāṅgaḥ śūlapāṇiḥ sa rākṣasaḥ |trivikramakṛtotsāho nārāyaṇa ivābabhau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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