वाल्मीकि रामायण 6.65.8
एष निर्याम्यहं युद्धमुद्यतः शत्रुनिर्जये।दुर्नयं भवतामद्य समीकर्तुमिहाहवे॥
eṣa niryāmyahaṃ yuddhamudyataḥ śatrunirjaye |durnayaṃ bhavatāmadya samīkartumihāhave ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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