वाल्मीकि रामायण 6.69.3
नूनं त्रिभुवनस्यापि पर्याप्तस्त्वमसि प्रभो।स कस्मात् प्राकृत इव शोचस्यात्मानमीदृशम्॥
nūnaṃ tribhuvanasyāpi paryāptastvamasi prabho |sa kasmāt prākṛta iva śocasyātmānamīdṛśam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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