वाल्मीकि रामायण 6.74.8
भिन्नलाङ्गूलहस्तोरुपादाङ्गुलिशिरोधरैः।स्रवद्भिः क्षतजं गात्रैः प्रस्रवद्भिस्ततस्ततः॥
bhinnalāṅgūlahastorupādāṅguliśirodharaiḥ |sravadbhiḥ kṣatajaṃ gātraiḥ prasravadbhistatastataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें