वाल्मीकि रामायण 6.83.8
समरे युद्ध्यमानानामस्माकं प्रेक्षतां पुरः।जघान रुदतीं सीतामिन्द्रिजिद्रावणात्मजः॥
samare yuddhyamānānāmasmākaṃ prekṣatāṃ puraḥ |jaghāna rudatīṃ sītāmindrijidrāvaṇātmajaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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