वाल्मीकि रामायण 6.87.7
तथेत्युक्त्वा महातेजाः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः।बभूवावस्थितस्तत्र चित्रं विस्फारयन् धनुः॥
tathetyuktvā mahātejāḥ saumitrirmitranandanaḥ |babhūvāvasthitastatra citraṃ visphārayan dhanuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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