वाल्मीकि रामायण 6.87.8
स रथेनाग्निवर्णेन बलवान् रावणात्मजः।इन्द्रजित् कवची धन्वी सध्वजः प्रत्यदृश्यत॥
sa rathenāgnivarṇena balavān rāvaṇātmajaḥ |indrajit kavacī dhanvī sadhvajaḥ pratyadṛśyata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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