वाल्मीकि रामायण 7.103.4
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरया ऽन्वितः ।न्यवेदयत रामाय तापसं तं समागतम्॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā saumitristvarayā 'nvitaḥ |nyavedayata rāmāya tāpasaṃ taṃ samāgatam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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