वाल्मीकि रामायण 7.110.2
तां नदीमाकुलावर्तां सर्वत्रानुसरन्नृपः ।आगतः सप्रजो रामस्तं देशं रघुनन्दनः॥
tāṃ nadīmākulāvartāṃ sarvatrānusarannṛpaḥ |āgataḥ saprajo rāmastaṃ deśaṃ raghunandanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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