वाल्मीकि रामायण 7.12.2
स्वसारं कालकेयाय दानवेन्द्राय राक्षसीम् ।ददौ शूर्पणखां नाम विद्युज्जिह्वाय नामतः॥
svasāraṃ kālakeyāya dānavendrāya rākṣasīm |dadau śūrpaṇakhāṃ nāma vidyujjihvāya nāmataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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