वाल्मीकि रामायण 7.12.4
कन्यासहायं तं दृष्ट्वा दशग्रीवो निशाचरः ।अपृच्छत्को भवानेको निर्मनुष्यमृगे वने ।अनया मृगशावाक्ष्या किमर्थं सह तिष्ठसि॥
kanyāsahāyaṃ taṃ dṛṣṭvā daśagrīvo niśācaraḥ |apṛcchatko bhavāneko nirmanuṣyamṛge vane |anayā mṛgaśāvākṣyā kimarthaṃ saha tiṣṭhasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें