वाल्मीकि रामायण 7.15.33
व्याघ्रो वराहो जीमूतः पर्वतः सागरो द्रुमः ।यक्षो दैत्यस्वरूपी च सो ऽदृश्यत दशाननः॥
vyāghro varāho jīmūtaḥ parvataḥ sāgaro drumaḥ |yakṣo daityasvarūpī ca so 'dṛśyata daśānanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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