वाल्मीकि रामायण 7.16.2
अथापश्यदृशग्रीवो रौक्मं शरवणं महत् ।गभस्तिजालसंवीतं द्वितीयमिव भास्करम्॥
athāpaśyadṛśagrīvo raukmaṃ śaravaṇaṃ mahat |gabhastijālasaṃvītaṃ dvitīyamiva bhāskaram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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