वाल्मीकि रामायण 7.16.3
स पर्वतं समारुह्य कञ्चिद्रम्यवनान्तरम् ।अपश्यत् पुष्पकं तत्र रामविष्टम्भितं तदा॥
sa parvataṃ samāruhya kañcidramyavanāntaram |apaśyat puṣpakaṃ tatra rāmaviṣṭambhitaṃ tadā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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