वाल्मीकि रामायण 7.16.4
विष्टब्धं पुष्पकं दृष्ट्वा ह्यगमं कामागं कृतम् ।अचिन्तयद्राक्षसेन्द्रः सचिवैस्तैः समावृतः॥
viṣṭabdhaṃ puṣpakaṃ dṛṣṭvā hyagamaṃ kāmāgaṃ kṛtam |acintayadrākṣasendraḥ sacivaistaiḥ samāvṛtaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें