वाल्मीकि रामायण 7.18.5
इन्द्रो मयूरः संवृत्तो धर्मराजस्तु वायसः ।कृकलासो धनाध्यक्षो हंसश्च वरुणो ऽभवत्॥
indro mayūraḥ saṃvṛtto dharmarājastu vāyasaḥ |kṛkalāso dhanādhyakṣo haṃsaśca varuṇo 'bhavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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