वाल्मीकि रामायण 7.23.5
स तु भोगवतीं गत्वा पुरीं वासुकिपालिताम् ।कृत्वा नागान्वशे हृष्टो ययौ मणिमयीं पुरीम्॥
sa tu bhogavatīṃ gatvā purīṃ vāsukipālitām |kṛtvā nāgānvaśe hṛṣṭo yayau maṇimayīṃ purīm ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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