वाल्मीकि रामायण 7.24.4
ताश्च सर्वाः समं दुःखान्मुमुचुर्बाष्पजं जलम् ।तुल्यमग्न्यर्चिषां तत्र शोकाग्निभयसम्भवम्॥
tāśca sarvāḥ samaṃ duḥkhānmumucurbāṣpajaṃ jalam |tulyamagnyarciṣāṃ tatra śokāgnibhayasambhavam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें