वाल्मीकि रामायण 7.25.3
ततो यूपशताकीर्णं सौम्यचैत्योपशोभितम् ।ददर्श विष्ठितं यज्ञं श्रिया सम्प्रज्वलन्निव॥
tato yūpaśatākīrṇaṃ saumyacaityopaśobhitam |dadarśa viṣṭhitaṃ yajñaṃ śriyā samprajvalanniva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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