वाल्मीकि रामायण 7.25.4
ततः कृष्णाजिनधरं कमण्डलुशिखाध्वजम् ।ददर्श स्वसुतं तत्र मेघनादं भयावहम्॥
tataḥ kṛṣṇājinadharaṃ kamaṇḍaluśikhādhvajam |dadarśa svasutaṃ tatra meghanādaṃ bhayāvaham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें