वाल्मीकि रामायण 7.27.30
सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च दुर्मुखो दूषणः खरः ।त्रिशिराः करवीराक्षः सूर्यशत्रुश्च राक्षसः॥
suptaghno yajñakopaśca durmukho dūṣaṇaḥ kharaḥ |triśirāḥ karavīrākṣaḥ sūryaśatruśca rākṣasaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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